सादगी और जनसेवा की मिसाल थे 'बदी साहब'
आजमगढ़। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं निजामाबाद विधानसभा क्षेत्र से लगातार पांच बार विधायक रहे आलम बदी का 92 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनके निधन के साथ आजमगढ़ ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसकी पहचान सादगी, ईमानदारी, जनसेवा और सिद्धांत आधारित राजनीति से थी। उनके निधन की खबर मिलते ही राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
आलम बदी उन विरले नेताओं में थे, जिन्होंने राजनीति को कभी सत्ता, वैभव या व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं बनाया। उन्होंने हमेशा जनसेवा को अपना उद्देश्य माना और अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में सादगी को ही अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाए रखा।
स्कूटी से विधानसभा पहुंचकर बने थे मिसाल
आलम बदी की सादगी का सबसे चर्चित उदाहरण तब सामने आया, जब वह स्कूटी से उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे। उस समय उनका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था। विधानसभा तक स्कूटी से पहुंचने वाले इस वरिष्ठ विधायक की सादगी की पूरे प्रदेश में चर्चा हुई। उन्होंने यह संदेश दिया कि जनप्रतिनिधि की पहचान उसके काफिले या सरकारी तामझाम से नहीं, बल्कि उसके कार्य और चरित्र से होती है।
वह अक्सर स्कूटर या साइकिल से ही क्षेत्र का दौरा करते थे। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने एक साधारण कार जरूर खरीदी, लेकिन कभी आलीशान वाहनों या बड़े सुरक्षा काफिलों के शौकीन नहीं रहे। नील से रंगा सफेद कुर्ता-पायजामा, टोपी, सादी सदरी और कभी जूते तो कभी चप्पल उनकी स्थायी पहचान थी।
विकास कार्यों में गुणवत्ता से नहीं करते थे समझौता
पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर रहे आलम बदी विकास कार्यों की तकनीकी बारीकियों को अच्छी तरह समझते थे। क्षेत्र में बनने वाली सड़कों, पुलों और अन्य निर्माण कार्यों का वह स्वयं निरीक्षण करते थे। यदि कहीं गुणवत्ता में कमी या भ्रष्टाचार की शिकायत मिलती तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय कराते थे। यही कारण था कि उनके विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर उनकी अलग पहचान बनी।
चुनाव प्रचार भी रहा सबसे अलग
आलम बदी का चुनाव प्रचार भी अन्य नेताओं से बिल्कुल अलग होता था। न बड़े-बड़े होर्डिंग, न झंडों की भरमार और न ही दिखावटी प्रचार। वह स्वयं गांव-गांव, मोहल्लों और बाजारों में जाकर लोगों से मिलते, उनकी समस्याएं सुनते और सीधे वोट मांगते थे। जनता से उनका सीधा संवाद ही उनकी सबसे बड़ी ताकत था। यही वजह रही कि निजामाबाद की जनता ने लगातार पांच बार उन्हें विधानसभा भेजा।
राजनीति को कभी नहीं बनाया कमाई का जरिया
उनके करीबी सहयोगी जैद अहमद फारूकी बताते हैं कि आलम बदी की ईमानदारी का अंदाजा उनके चुनावी शपथपत्रों से लगाया जा सकता है। विधायक रहने के बावजूद उनके बैंक खाते में बहुत कम धनराशि दर्ज होती थी। उन्होंने कभी राजनीति को धन अर्जित करने का माध्यम नहीं बनाया। उनका मानना था कि जनप्रतिनिधि का सबसे बड़ा धन जनता का विश्वास होता है।
उर्दू में शपथ के लिए दो वर्ष तक किया संघर्ष
वर्ष 1996 में पहली बार विधायक बनने के बाद आलम बदी ने विधानसभा में उर्दू भाषा में शपथ लेने की इच्छा जताई थी। उस समय उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली। तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष केसरी नाथ त्रिपाठी से लेकर राज्यपाल तक उन्होंने अपनी बात रखी। उनका कहना था कि उन्हें हिंदी से कोई आपत्ति नहीं, लेकिन संविधान प्रदत्त अधिकार के तहत वह उर्दू में शपथ लेना चाहते हैं। लगभग दो वर्षों तक उन्होंने शपथ नहीं ली। बाद में विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेने के लिए उन्होंने हिंदी में शपथ ग्रहण की।
इंजीनियर की नौकरी छोड़ चुना जनसेवा का मार्ग
आलम बदी का जन्म 16 सितंबर 1936 को आजमगढ़ के बिंदवल गांव में हुआ था। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने गोरखपुर सिंचाई विभाग में नौकरी की, लेकिन महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के विचारों से प्रेरित होकर सरकारी सेवा छोड़ समाजसेवा और समाजवादी आंदोलन का रास्ता चुना।
पांच बार बने विधायक, मंत्री पद भी ठुकराया
वर्ष 1996, 2002, 2012, 2017 और 2022 में वह निजामाबाद विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए। वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर उन्हें मंत्री बनाए जाने का प्रस्ताव भी मिला, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मंत्री पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि वह अपने क्षेत्र की जनता के बीच रहकर सेवा करना चाहते हैं। विधानसभा में उन्होंने विभिन्न समितियों, विशेषकर प्राक्कलन समिति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हमेशा याद रहेंगे 'बदी साहब'
आलम बदी का निधन केवल समाजवादी पार्टी की नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक राजनीति की भी बड़ी क्षति है। उन्होंने अपने पूरे जीवन से यह साबित किया कि सादगी, ईमानदारी, जनसेवा और सिद्धांतों पर आधारित राजनीति आज भी संभव है। उनके समर्थक ही नहीं, राजनीतिक विरोधी भी उनके शालीन व्यवहार, निष्पक्ष छवि और जनप्रतिबद्धता का सम्मान करते थे।
आजमगढ़ की राजनीति में 'बदी साहब' का नाम हमेशा उस जननेता के रूप में याद किया जाएगा, जिसने पद से अधिक जनता का विश्वास कमाया।

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