पांच करोड़ की सुपारी की चर्चा से लेकर यूपी के सबसे कुख्यात गैंगस्टरों में शुमार होने तक की कहानी
लखनऊ। 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में अपराध की दुनिया में तेजी से उभरे गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम आज भी यूपी के चर्चित अपराधियों में लिया जाता है। हत्या, अपहरण, लूट और सुपारी किलिंग जैसी वारदातों के जरिए उसने खौफ कायम किया था। लेकिन 22 सितंबर 1998 को पुलिस मुठभेड़ में उसकी कहानी खत्म हो गई। उसकी लोकेशन तक पहुंचने में एक मोबाइल फोन और गर्लफ्रेंड से बातचीत अहम सुराग साबित हुई।
सीएम कल्याण सिंह को हत्या की धमकी
पूर्व पुलिस अधिकारी अजय राज शर्मा ने अपनी किताब Biting the Bullets: Memoirs of a Police Officer में लिखा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने उन्हें श्रीप्रकाश शुक्ला से खतरे के बारे में बताया था। किताब के अनुसार, शुक्ला पर मुख्यमंत्री की हत्या के लिए पांच करोड़ रुपये की सुपारी लेने की बात सामने आई थी। इसी खतरे से निपटने के लिए एक विशेष बल की जरूरत महसूस हुई और 1998 में उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) का गठन किया गया। जय राज शर्मा को STF की कमान दी गई। उनका उद्देश्य संगठित अपराध और खासतौर पर श्रीप्रकाश शुक्ला के गैंग पर प्रभावी कार्रवाई करना था।
शिक्षक के बेटे से बना गैंगस्टर
बताया जाता है कि श्रीप्रकाश शुक्ला एक शिक्षक का बेटा था। 1993 में बहन से कथित छेड़छाड़ के विवाद के बाद एक युवक की हत्या के मामले में उसका नाम सामने आया। गिरफ्तारी से बचने के लिए वह बैंकॉक चला गया। वापस लौटने के बाद वह अपराध की दुनिया में सक्रिय हो गया और धीरे-धीरे पूर्वांचल के बाहुबलियों के संपर्क में आया। 1997 में उसने कई सनसनीखेज वारदातों को अंजाम दिया। लखनऊ में लॉटरी कारोबारी की हत्या, आलमबाग में ट्रिपल मर्डर और 31 मार्च 1997 को वीरेंद्र शाही की हत्या ने उसे अपराध की दुनिया में कुख्यात बना दिया। इसके बाद बिल्डर के अपहरण और फिरौती की घटना ने भी उसकी दहशत बढ़ाई। बिहार में बाहुबली नेता बृजबिहारी प्रसाद की हत्या में भी उसका नाम सामने आया।
14 सिम कार्ड और पुलिस की नई तकनीक
श्रीप्रकाश शुक्ला पुलिस की निगरानी से बचने के लिए कई मोबाइल नंबर और सिम कार्ड इस्तेमाल करता था। रिपोर्टों के मुताबिक उसके पास करीब 14 सिम कार्ड थे। उस दौर में मोबाइल फोन तकनीक नई थी और पुलिस के लिए किसी मोबाइल की लोकेशन ट्रेस करना भी चुनौतीपूर्ण था। STF ने तकनीकी निगरानी के जरिए उसकी गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की। इसी दौरान उसकी गोरखपुर की एक महिला मित्र से फोन पर बातचीत पुलिस के लिए महत्वपूर्ण सुराग बन गई।
गर्लफ्रेंड का फोन बना लोकेशन का सुराग
शुक्ला को पता था कि उसके मोबाइल फोन ट्रेस किए जा सकते हैं, इसलिए वह कई बार पीसीओ से फोन करता था। लेकिन पुलिस ने उसकी महिला मित्र के फोन को भी निगरानी में रखा। दिल्ली में मौजूद शुक्ला जब गोरखपुर की महिला मित्र से संपर्क करता था, तो पुलिस को उसकी गतिविधियों की कड़ी जोड़ने में मदद मिलती थी। सितंबर 1998 में STF को उसके दिल्ली और गाजियाबाद आने-जाने की जानकारी मिली। 22 सितंबर को एयरपोर्ट पर उसकी घेराबंदी की गई, लेकिन वह वहां नहीं पहुंचा। अगले दिन उसने फोन पर बताया कि वह एयरपोर्ट नहीं जा सका और अब गाजियाबाद में किसी काम से जाएगा।
इंदिरापुरम के पास घेरा गया
शुक्ला जिस पीसीओ से फोन कर रहा था, STF वहां तक पहुंच गई। इसके बाद पुलिस ने उसका पीछा शुरू किया। वह अपनी नीली कार से NH-24 की ओर निकला। इंदिरापुरम के पास उसे पीछा किए जाने का अंदेशा हुआ तो उसने कार कच्चे रास्ते पर उतार दी। आगे रास्ता बंद होने के बाद वह पुलिस से आमने-सामने हो गया। रिपोर्टों के अनुसार, शुक्ला ने फायरिंग शुरू की और पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की। मुठभेड़ में 24 वर्षीय श्रीप्रकाश शुक्ला के साथ उसके दो साथी अनुज प्रताप सिंह और सुधीर त्रिपाठी भी मारे गए। श्रीप्रकाश शुक्ला अक्सर कहा करता था कि “जो पहली गोली मारे, वही बादशाह है।” लेकिन सितंबर 1998 में पुलिस के साथ हुई आखिरी मुठभेड़ में उसका यही अंदाज उसके लिए भारी पड़ गया। इस पूरे ऑपरेशन में तकनीकी निगरानी, फोन कॉल और लगातार की गई ट्रैकिंग ने STF को उस गैंगस्टर तक पहुंचने में अहम भूमिका निभाई। इसी कार्रवाई ने उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध के खिलाफ STF के शुरुआती बड़े अभियानों में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा।

0 Comments