देवरिया। कहावत है— “पुरुष बली नहीं होता, समय होता है बलवान।” यह पंक्तियाँ इस वक्त पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर पर पूरी तरह लागू होती दिख रही हैं। वर्ष 1998–2000 में जब वे देवरिया के पुलिस अधीक्षक थे, तब कई बार जिला जेल का निरीक्षण किया करते थे। सुरक्षा-व्यवस्था, बंदियों के हालात और जेल की खामियों पर उनकी पैनी नजर रहती थी। आज विडंबना यह है कि वही जेल उनकी रिहाइश बन चुकी है।
हाई-सिक्योरिटी बैरक में क़ैद
औद्योगिक प्लॉट की खरीद-फरोख्त में जालसाजी के आरोप में गिरफ्तार रिटायर्ड आईपीएस अमिताभ ठाकुर को बुधवार को अदालत में पेश करने के बाद जिला कारागार भेजा गया। उन्हें हाई-सिक्योरिटी बैरक में रखा गया है।
सूत्रों के मुताबिक, जेल में उनकी पहली रात बेहद बेचैनी में कटी। सामान्य बंदियों की तरह उन्हें वही साधारण कंबल दिया गया, जिसे ओढ़कर उन्होंने जमीन पर रात बिताई। पूरी रात करवटें बदलते रहे और मुश्किल से सो पाए।
जेल में भी जारी ‘लेखन’— अधिकारियों में बेचैनी
अमिताभ ठाकुर अपने साथ लगभग 50–60 पन्ने A4 शीट लेकर पहुंचे हैं। मौका मिलते ही वे लगातार कुछ न कुछ लिखते देखे जा रहे हैं। क्या लिख रहे हैं, यह कोई नहीं जानता— लेकिन जेल अधिकारियों के बीच यह चर्चा तेज है कि कहीं वे कारागार की खामियों का ब्योरा बनाकर शासन को भेजने की तैयारी न कर रहे हों।
एक पुलिस अधिकारी के रूप में उन्होंने लंबे समय तक जेलों के निरीक्षण किए हैं, इसलिए यहां की व्यवस्थाओं और कमजोरियों से भली-भांति परिचित हैं। यही बात जेल प्रशासन की चिंता बढ़ा रही है।
कम खाया भोजन, सुबह भी दिखे उदास
भोजन में उन्हें रोटी, चावल, दाल और पालक का साग दिया गया। लेकिन उन्होंने सिर्फ एक रोटी और थोड़ा सा चावल ही खाया। सुबह 6 बजे उठकर नित्यक्रिया के बाद फिर कागजों पर लिखने में जुट गए। गुरुवार सुबह उन्हें बेहद मनोवैज्ञानिक रूप से थका और निराश देखा गया।

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