मनोज श्रीवास्तव/लखनऊ। उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के चयन को लेकर पार्टी के भीतर गहमागहमी तेज हो गई है। हाल ही में घोषित 14 जिला व महानगर इकाइयों में दागी नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाने और कई नए चेहरों को मौका देने के बाद अब बाकी 14 इकाइयों को लेकर उच्च स्तर पर विचार मंथन चल रहा है। नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति इन्हीं लंबित इकाइयों के साथ जुड़े संकेतों से तय मानी जा रही है।दो दिन पूर्व घोषित सूची में पार्टी के भीतर विवादित माने जाने वाले नेताओं को बाहर कर दिया गया, जिनमें फतेहपुर के जिलाध्यक्ष मुखलाल पाल भी शामिल हैं, जिन्हें भाजपा की मार्केटिंग छवि मजबूत करने वाली टीम का करीबी माना जाता था। इसके साथ ही पाँच पुराने और नौ नए चेहरों को जिम्मेदारी दी गई है।
विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा नेतृत्व राज्य में संगठन को नए ढांचे में ढालने की कोशिश कर रहा है, ताकि 2024 लोकसभा चुनाव के बाद कमजोर पड़ी पकड़ को दोबारा मजबूत किया जा सके। उत्तर प्रदेश देश की सर्वाधिक 80 लोकसभा सीटों वाला राज्यकृभाजपा के लिए हमेशा निर्णायक साबित रहा है, लेकिन 2024 में पार्टी के सामने चुनौती बढ़ी। मतदाताओं में घटते प्रभाव ने रणनीतिकारों को चिंतित किया है। हालांकि चुनाव आयोग द्वारा लागू किए गए एसआईआर (सीट अलोकेशन रेशियो) के कारण भाजपा को कुछ हद तक राहत मिली, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर असंतोष बना हुआ है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, नए प्रदेश अध्यक्ष का चयन इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा सामाजिक समूह भाजपा के बड़े वोट बैंक में नई सेंध लगा सकता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ही संगठन में उपेक्षित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के पक्षधर बताए जा रहे हैं।
केंद्रीय नेतृत्व की अनिश्चितता से कार्यकर्ताओं में बेचैनी
कई महीनों से लंबित यह निर्णय कार्यकर्ताओं की ऊर्जा पर असर डाल रहा है। लगातार कयासों के कारण प्रदेशभर में भाजपा कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद, दिल्ली में राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के आवास पर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में यूपी के अनेक नेताओं को सम्मानित किया गया। राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे मनोबल बढ़ाने की कोशिश बताते हैं, ताकि 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू की जा सके।
अगले प्रदेश अध्यक्ष की सबसे बड़ी परीक्षा
जानकारों का मानना है कि प्रदेश अध्यक्ष के सामने सबसे कठिन काम होगा। कंपनी मोड में काम करने वाले पुराने कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल बैठाना। वर्चुअल राजनीति से बाहर निकालकर उन्हें जमीन स्तर पर सक्रिय करना। भाजपा के नए महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह को हालांकि जमीनी सोशल इंजीनियरिंग का विशेषज्ञ माना जाता है। संघ पृष्ठभूमि से जुड़े होने के चलते वे संगठन को फिर से सर्वस्पर्शी नेतृत्व की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे हैंकृजिससे कई “कमर्शियल शैली” के नेताओं की भूमिका स्वतः सीमित होती जा रही है।
सूत्रों के अनुसार, भाजपा के भीतर “टीम गुजरात” के कई रणनीतिकार ऐसे नेतृत्व की तलाश में हैं जो जरूरत पड़ने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बराबर राजनीतिक मुकाबले की क्षमता रखता हो। लेकिन पूर्वी और पश्चिमी यूपी के संघ प्रचारकों के मजबूत नेटवर्क ने इस प्रयास को आसान नहीं होने दिया है।
योगी सरकार की बुलडोजर कार्रवाई, कानून-व्यवस्था और अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की नीति ने उन्हें प्रदेश में प्रभावशाली प्रशासक के रूप में स्थापित किया है। चर्चा है कि विभिन्न राज्यों में जीत-हार के श्रेय वितरण को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष है। हार होने पर स्थानीय नेतृत्व को दोष देना। जीत होने पर “टीम गुजरात” को श्रेय देना। ऐसी प्रवृत्तियों को लेकर कई प्रदेशों में नाराजगी देखने को मिल रही है। यूपी में भी कार्यकर्ताओं का वास्तविक गुस्सा “बाहरी एजेंटों” पर बताया जा रहा है, जो नेतृत्व को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 2024 में जीत का अंतर कम होने के बाद संगठन ने विशेष निगरानी बढ़ाई है। लेकिन स्थानीय स्तर पर विकास और प्रबंधन के लिए अब भी “योगी मॉडल” को ही असरदार माना जा रहा है। यदि प्रदेश अध्यक्ष का चयन “टीम गुजरात” की पसंद के अनुसार होता है, तो माना जा रहा है कि संगठन की जमीनी गतिविधियों पर असर पड़ सकता है, कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ सकता है। वहीं संघ की राय को दरकिनार किया गया तो “जमीनी कैडर” को संभालना चुनौतीपूर्ण होगा।

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