आजमगढ़ : प्रकृति से मिले रंगों संग होली मनाएं....प्रेम, सौहार्द और पर्यावरण संरक्षण का बनाएं प्रतीक!



आजमगढ़। होली पर्व को सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से मनाने की अपील करते हुए ग्लोबल हॉस्पिटल के प्लास्टिक सर्जन डॉ. सुभाष सिंह ने कहा कि केमिकल युक्त रंगों से लोगों को खास तौर पर बचना चाहिए। उन्होंने बताया कि आज बाजार में उपलब्ध अधिकांश रंग रासायनिक होते हैं, जो त्वचा, आंखों और बालों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
डॉ. सिंह ने कहा कि हालांकि अब कई कंपनियां हर्बल और प्राकृतिक रंग भी बाजार में ला रही हैं, लेकिन लोगों को चाहिए कि वे उन्हीं रंगों को प्राथमिकता दें। पहले के समय में होली टेसू (पलाश) के फूल, हल्दी, चंदन और अन्य प्राकृतिक स्रोतों से बने रंगों से खेली जाती थी, जो पूरी तरह सुरक्षित होते थे और प्रकृति से जुड़ाव का संदेश भी देते थे।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि केमिकल रंग न सिर्फ मानव शरीर के लिए हानिकारक हैं, बल्कि होली के बाद जल स्रोतों और नालियों में बहकर पर्यावरण को भी प्रदूषित करते हैं। इससे जल जीवन और प्रकृति को भारी नुकसान होता है। डॉ. सिंह ने सलाह दी कि होली खेलने से पहले त्वचा पर नारियल का तेल या अच्छा मॉइश्चराइजर जरूर लगाएं, ताकि रंगों का दुष्प्रभाव कम हो सके। उन्होंने रंग भरे गुब्बारों से होली खेलने पर भी सख्त चेतावनी दी। डॉ. सिंह के अनुसार, गुब्बारों से आंखों और शरीर के अन्य हिस्सों पर गंभीर चोट लगने की आशंका रहती है और कई मामलों में बच्चों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है। इसलिए ऐसे खतरनाक तरीकों से बचना बेहद जरूरी है।
डॉ. सिंह ने लोगों से अपील की कि होली के दौरान पानी की बर्बादी न करें और जहां तक संभव हो सूखी होली एवं गुलाल से ही त्योहार मनाएं। उन्होंने कहा कि “सूखी होली” न केवल सुरक्षित है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी दर्शाती है। अंत में उन्होंने संदेश दिया कि प्रकृति से मिले रंगों के साथ होली मनाएं और इस पर्व को प्रेम, सौहार्द और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बनाएं।

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