5 जनवरी को गोरखपुर में शक्ति प्रदर्शन करेंगे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी...CM योगी की मौजूदगी पर सस्पेंस!



मनोज श्रीवास्तव / लखनऊ। भाजपा के नव निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष एवं केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी 5 जनवरी को पहली बार अपने गृह जनपद गोरखपुर के दौरे पर आ रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद यह उनका पहला गोरखपुर प्रवास होगा, जिसे संगठन ऐतिहासिक बनाने में जुट गया है। स्वागत कार्यक्रम में एक लाख कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाने के लिए बूथ स्तर तक संदेश भेजे जा चुके हैं।
गोरखपुर क्षेत्रीय अध्यक्ष सहजानंद राय लगातार प्रवास कर कार्यक्रम की तैयारियों की निगरानी कर रहे हैं। गोरखपुर क्षेत्र के अंतर्गत तीन मंडल और दस जिले आते हैंकृ गोरखपुर, महराजगंज, देवरिया, कुशीनगर, बस्ती, संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर, आजमगढ़, मऊ और बलिया। इन सभी जिलों से कार्यकर्ताओं के पहुंचने की संभावना है।
राजनीतिक रूप से गोरखपुर आज उत्तर प्रदेश में भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ल, दो केंद्रीय मंत्री, राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल, राष्ट्रीय मंत्री संगीता यादव और कई प्रदेश स्तरीय पदाधिकारी इसी क्षेत्र से हैं।
हालांकि पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल इस कार्यक्रम के दौरान गोरखपुर में मौजूद नहीं रहेंगे, जिसे राजनीतिक गलियारों में खास संकेत के रूप में देखा जा रहा है। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी को लेकर भी संशय बना हुआ है, जिस पर अंतिम निर्णय कार्यक्रम के आसपास ही स्पष्ट होगा।
प्रदेश के जलशक्ति मंत्री एवं गोरखपुर के प्रभारी मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह की उपस्थिति पर भी सबकी निगाहें टिकी हैं। इस दौरे का जातीय और संगठनात्मक सियासी महत्व भी कम नहीं है। हाल ही में ब्राह्मण विधायकों की बैठक को लेकर पंकज चौधरी की टिप्पणी से उपजे विवाद की गूंज अभी पूरी तरह थमी नहीं है। पूर्वांचल में पहले से मौजूद ठाकुर-ब्राह्मण समीकरण के बीच कुर्मी नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति को लेकर भी चर्चा तेज है।
सूत्रों के अनुसार संगठन ने स्वागत कार्यक्रम में ठाकुर और ब्राह्मण कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं, ताकि किसी भी तरह का जातीय संदेश बाहर न जाए। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पूर्वांचल की जातीय राजनीति में इस कार्यक्रम को एक “लिटमस टेस्ट” की तरह देखा जाएगा।

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