महेंद्र राजभर ने कहा कि जिन सिंद्धातों पर चलने का राष्ट्रीय अध्यक्ष ने संकल्प लिया था, आज वह भटक गए हैं. परिवार को बढ़ावा दे रहे हैं. ऐसे में अब पार्टी में कार्यकर्ताओं को छला महसूस हो रहा है. ऐसे में अब वह वजूद यहां नहीं है. सुभासपा अध्यक्ष केवल सत्ता का स्वाद लेना चाह रहे हैं जब चाहते किसी अन्य दल के साथ चले जाते. ऐसे में यह पार्टी अब अपने रास्ते से भटक गई है.
उन्होंने कहा कि 20 साल पहले 27 अक्टूबर 2002 को सबकी मौजूदगी में पार्टी की स्थापना की गई थी. उस समय पार्टी का मिशन गरीब, दलित, मजदूर और वंचित समाज का उत्थान रखा गया था जबकि उसके बाद से कार्यकर्ताओं के खून-पसीने से बनी पार्टी का इस्तेमाल उन्होंने केवल धन बटोरने के लिए किया.उनकी इस सियासत से आहत होकर प्रदेश महासचिव अर्जुन चौहान, प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ.अवधेश राजभर सहित दर्जनों साथियों सहित सुभासपा की सदस्यता छोड़ने का निर्णय लिया है.
वहीं इस बगावत पर प्रतिक्रिया देते हुए अरुण राजभर ने एक निजी चैनल से कहा कि सुभासपा एक पाठशाला की तरह है. यहां सीखने के बाद जब लोगों को बड़ी डिग्री लेने की आकांक्षा जागती है तो इस तरह के कदम उठाते हैं. महेन्द्र राजभर काफी समय से पार्टी में हैं. आज अचानक से क्या हो गया? जो उन्होंने ऐसा निर्णय लिया.

0 Comments