Mj Vivek
आजमगढ़। शहर के गुरूटोला में वकील बाबू गोपालदास के पुत्र के रूप में 24 दिसबंर 1914 को जन्म लेने वाले डा. परमेश्वरी लाल गुप्त बहुमुखी प्रतिभा धनी थे। उनके पिता की प्रबल इच्छा थी कि बेटा बड़ा होकर बैरिस्टर बने। इसके लिए उन्होंने शहर सबसे प्रमुख शिक्षा संस्थान वेस्ली हाईस्कूल में कक्षा चार में लिखाया। किन्तु वर्ष 1930 में देश में गांधी जी ने नमक सत्याग्रह आंदोलन चलाया था। इसी से प्रेरित होकर श्री गुप्त भी आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने स्कूल के अन्य छात्रों को आंदोलन से जोड़ने के लिए सभी कक्षों में छोटी-छोटी पर्ची भेजना शुरू किया। फलस्वरूप प्रधानाचार्य द्वारा उन्हें कालेज से निकाल दिया गया। छात्र जीवन से मुक्त होने बाद पूरी तरह से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। स्वयंसेवक के रूप में शराब ताड़ी और विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देना, नमक बनाना, गांवों में घूम कर व्याख्यान देना और जेल जाना उनकी दिनचर्या बन गई। उनकी लगन को देखते हुए उन्हें आजमगढ़ का नेहरू कहा जाने लगा था।
लेकिन 1947 में जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने हाईस्कूल, 1948 में इंटरमीडिएट, 1950 में बीए तथा 1952 में एमए की कक्षा उत्तीर्ण की और 1960 में काशी हिन्दू विश्व विद्यालय वाराणसी से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। अपनी प्रतिभा से प्रगति की ओर अग्रसर होते हुए पुरातत्व के सर्वोच्च केन्द्र प्रिन्स आफ वेल्स म्यूजियम बाम्बे में मुद्रातत्ववेत्ता की नौकरी प्राप्त की। उन्हें इतिहास, पुरातत्व और मुद्रातत्व में विशेष शोध के लिए ब्रिटिश म्यूजियम लंदन भेजा गया। उन्होंने वर्ष 1984 में इंडियन इन्स्टीटयूट आफ रिसर्च इनयूमिसनेटिक स्टडीज नाम की संस्था की स्थापना की जिसके 1992 तक डाइरेक्टर रहे। इनके बारे में विदेशी विद्वान डा. ए.एल.वाशम ने कहा कि भारत के सभी प्रदेशों के अनेक विद्वानों से मिला हूं और उनमें से अनेक को अपना मित्र भी बनाया है किन्तु बहुत कम ही होंगे जिन्हें डा. परमेश्वरी लाल गुप्त जैसा स्थान हो।
पुस्तकालय व अग्रसेन कन्या पाठशाला की रखी नींव
आजमगढ़ में सरयू के किनारे के बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए स्वजातीय युवकों को लेकर अग्रवाल सेवक मंडल की स्थापना की। प्रत्येक रविवार को मंडल की एक बैठक बिहारी जी के मंदिर में होती थी। जिसमें परमेश्वरी लाल ने एक पुस्तकालय की स्थापना की मांग उठाई और लोगों के सहयोग से अग्रवाल पुस्तकालय की स्थापना हुई जो आज मृत प्राय स्थिति में पहुंच गया है। नगर की बालिकाओं की शिक्षा के लिए 13 जुलाई 1934 में 12 बच्चों के साथ गुरूटोला में शुरूआत की। 1939 में अग्रसेन कन्या पाठशाला की नींव रखी। उन्होंने समाज में व्याप्त दहेज और वेश्यावृत्ति के विरोध में एक नाटक समाज की नागिन लिखी। रंगमंचीय कलाकार गंगा राग सक्सेना के निर्देशन में यह नाटक सब्जीमंडी में खेला गया। जिसमें वेश्या की भूमिका के लिए किसी कलाकार के तैयार न होने पर यह भूमिका स्वयं उन्होंने ही निभाई।
सत्याग्रही के रूप में मिली छः माह की कठोर कारावास
छपाई की उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 1933 एक प्रेस प्रभात प्रिंटि काटेज की स्थापना की। 1934 में एक साप्ताहिक पत्र संदेश निकालना प्रारम्भ किया। इसमें सामयिक समाचारों के साथ ही कविता, कहानी, लेख, नाटक तथा महिला स्तम्भ आदि भी प्रकाशित होते थे। इस दौरान वह आज अखबार के नगर संवाददाता नियुक्त हुए और नगर की तत्कालीन समाचार प्रकाशित करवाते रहे। उनकी लेखन शैली पाठकों के लिए बड़ी रूचिकर होती थी। 1941 में जब महात्मा गांधी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू किया तो वह पुनः सक्रिय हो गए। आजमगढ़ नगर से सत्याग्रह करने वाले एक मात्र सत्याग्रह थे। वह पकड़े गए और उन्हें छः माह के कठोर कारावास की सजा दी गई।
कई भाषाओं पर रखते थे अच्छी पकड़
डा. परमेश्वरी लाल गुप्त को हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कत, फारसी, आदि कई भाषाओं का ज्ञान था। जिसका उपयोग उन्होंने प्राचीन सिक्कों पर अंकित लिपियों को पढ़ने तथा विविध पुस्तकों के लेखन में किया। पुरातत्व इतिहास और मु्रदातत्व संबंधी उनकी पुस्तकों में पुरातत्व परिचय, भारतीय वास्तुकला, हमारे देश के सिक्के, भारत के पूर्वकालिक सिक्के, गुप्त साम्राज्य राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक इतिहास हिन्दी में तथा पंचामार्क क्वायन्स, अमरावती होर्ड आव सिटीचर पंचमार्क्स क्वायन्स, अर्ली क्वायन्स आफ केरल, रोमन क्वायन्स फ्राम आन्ध्र प्रदेश, द इम्पीरियल गुप्ताज, पेपरमनी आफ इंडिया, क्वायन्स लन्ड ऐन्ड पीपुल अंग्रेजी में है। इनमें भारतीय वास्तुकला पर नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा हीरालाल स्वर्णपदक मिला। क्वायन्स लैन्ड ऐन्ड पीपुल प्राचीन से लेकर वर्तमान तक के सिक्कों संबंध में जानकारी उपलब्ध कराने वाली अति महत्वपूर्ण पुस्तक है। बहुमुखी प्रतिभा के इस मनीषी ने कभी प्रचार की कामना नहीं की। अतः सारी विद्वता, योग्यता के बाद भी वह लोगों के लिए प्रभावी नहीं बन सके। उनकी मृत्यु करीब 87 वर्ष की अवस्था में 29 जुलाई 2001 में मुम्बई में हुई।
0 Comments