Mj vivek/लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के साथ दलित मतदाताओं को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ रही है। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में 86 सीटें आरक्षित हैं। इनमें 84 अनुसूचित जाति और दो अनुसूचित जनजाति के लिए हैं। सरकार बनाने के लिए 202 सीटों का आंकड़ा पार करना होता है, ऐसे में आरक्षित सीटों का प्रदर्शन किसी भी दल के व्यापक चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है।
सपा का PDA पर जोर
समाजवादी पार्टी ने 2027 के लिए दलित मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया है। पार्टी की रणनीति दलित नेतृत्व को संगठन में सक्रिय करने और पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की है। सामान्य सीटों पर भी दलित चेहरों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति इसी प्रयास का हिस्सा मानी जा रही है।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 17 एससी आरक्षित सीटों का परिणाम इस बहस को नया आधार देता है। भाजपा ने आठ, सपा ने सात, कांग्रेस ने एक और आजाद समाज पार्टी ने एक सीट जीती। इस तरह विपक्षी दलों ने संयुक्त रूप से नौ आरक्षित सीटें हासिल कीं, जबकि भाजपा के खाते में आठ सीटें आईं।
2022 में भाजपा गठबंधन की बढ़त
विधानसभा चुनाव के आंकड़े हालांकि अलग तस्वीर दिखाते हैं। 2017 में भाजपा ने 84 एससी आरक्षित सीटों में से 69 पर जीत दर्ज की थी। सहयोगियों को मिलाकर भाजपा गठबंधन की संख्या 74 रही थी।
2022 में भाजपा और अपना दल (एस) ने 63 एससी आरक्षित सीटें जीतीं। दोनों एसटी सीटें भी भाजपा के खाते में गईं, जिससे भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन की कुल संख्या 65 हुई। वहीं सपा ने 16 एससी सीटें जीतीं। उसके सहयोगी सुभासपा ने तीन और रालोद ने एक सीट हासिल की। इस तरह सपा गठबंधन के खाते में 20 आरक्षित सीटें आईं।
इन आंकड़ों से साफ है कि भाजपा गठबंधन का आरक्षित सीटों पर आधार मजबूत रहा, लेकिन सपा गठबंधन ने 2022 में अपना प्रदर्शन बेहतर किया।
बसपा का वोट भी रहेगा अहम
दलित राजनीति में बसपा की भूमिका भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती। 2024 में पार्टी उत्तर प्रदेश की कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसे करीब 9.39 प्रतिशत वोट मिले। इसलिए सीटों की संख्या कम होने के बावजूद दलित मतदाताओं के बीच बसपा के शेष प्रभाव का चुनावी समीकरण पर असर पड़ सकता है।
2027 में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बसपा अपने पारंपरिक मतदाताओं को किस हद तक अपने साथ बनाए रखती है और उसके वोट का वितरण अन्य दलों के बीच किस तरह होता है।
भाजपा के सामने पिछला प्रदर्शन दोहराने की चुनौती
भाजपा के लिए आरक्षित सीटों पर अपना आधार बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। 2017 में जहां भाजपा गठबंधन ने 74 आरक्षित सीटें जीती थीं, वहीं 2022 में यह संख्या 65 रह गई। 2024 लोकसभा चुनाव में भी भाजपा 17 आरक्षित सीटों में आठ पर सिमट गई।
वहीं सपा 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी। इसके लिए उसे दलित मतदाताओं के साथ अपने व्यापक सामाजिक गठजोड़ को जमीन पर मजबूत करना होगा।
86 सीटों से आगे है असली लड़ाई
2027 में दलित राजनीति का सवाल केवल 86 आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। सामान्य सीटों पर दलित मतदाताओं का रुख, विभिन्न दलित समूहों के बीच समर्थन का बंटवारा, उम्मीदवारों की सामाजिक स्वीकार्यता और गठबंधन का स्वरूप भी परिणामों को प्रभावित करेगा।
2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं का चुनावी रुख एकतरफा नहीं रहा है। इसलिए 2027 में राजनीतिक दलों के लिए चुनौती सिर्फ दलित वोट हासिल करने की नहीं, बल्कि उसे अपने व्यापक सामाजिक गठबंधन में जोड़कर सीटों में बदलने की होगी।

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