दलित वोट बैंक को साधने के लिए अखिलेश ने बनाई ये खास रणनीति...

सपा के संविधान में हुआ बड़ा बदलाव


लखनऊ।
दलितों को लेकर लगातार प्रयोग कर रही समाजवादी पार्टी ने अपने संविधान में बड़ा बदलाव किया है। कोलकाता में सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के नेताओं ने तय किया है कि डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ ही अब कार्यक्रमों में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को भी मान्यता दी जाएगी। इसके लिए सपा ने बाबा साहब वाहिनी फ्रंटल संगठन भी गठित कर दिया है। बाबा साहब वाहिनी डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को आगे बढ़ाएगी। इसके साथ ही यह वाहनी दलितों के मुद्दे पर लगातार धरना प्रदर्शन के साथ ही वैचारिकी अभियान चलाएगी। बाबा साहब वाहिनी लोगों को समझाएगी कि डॉ. राम मनोहर लोहिया और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों में कई समानताएं हैं।

वाहिनी ये भी बताएगी कि बदले हुए सियासी हालातों में संविधान पर छाए संकट को सिर्फ सपा ही दूर कर सकती हैं। इसके लिए वाहिनी के पदाधिकारी विधानसभा क्षेत्रवार वैचारिकी कार्यक्रमों का आयोजन करेंगे। दलितों के मुद्दों पर बाबा साहब वाहिनी समय-समय पर रिसर्च रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। दलित वर्ग के छात्रों के साथ ही शिक्षित बेरोजगार, शिक्षक, डॉक्टर, अधिवक्ता और अधिकारियों के बीच वाहिनी खासतौर से अपनी पैठ बनाएगी। समय-समय पर विशेषज्ञों की राय लेकर दलित एजेंडे पर बसपा की तर्ज पर वाहिनी प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाएगी। दलितों को पार्टी से जोड़ने के लिए हर 3 महीने में वाहिनी सपा प्रमुख अखिलेश यादव को अपनी रिपोर्ट देगी।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में समाजवादी पार्टी ने दलित वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने के लिए पार्टी के पुराने दलित नेता अवधेश प्रसाद और रामजीलाल सुमन को आगे किया था। दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के लिए सपा ने इस वर्ग के पुराने नेताओं को साधने की कोशिशें भी शुरू कर दी हैं। इसी क्रम में बसपा से किनारे किए गए कई दलित नेता जल्द समाजवादी पार्टी का हिस्सा बन सकते हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि बसपा से सपा में आने वाले पूर्व कैबिनेट मंत्री इंद्रजीत सिंह सरोज और केके गौतम को ये जिम्मेदारी सौंपी गई है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव जनता में पकड़ रखने वाले दूसरे दल के नेताओं को अहम जिम्मेदारी देने को भी तैयार हैं।

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