... अब मजबूत विपक्ष की कमान संभालेंगे की तैयारी में अखिलेश-जाने क्या है प्लान



लखनऊ। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने आजमगढ़ लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर यह तो साफ कर दिया है कि अब उनका पूरा ध्यान पूरी तरह यूपी की सियासत पर होगा। 18वीं विधान सभा चुनाव में उन्हें सरकार बनाने का भले ही मौका न मिला हो पर वे सदन में मजबूत विपक्ष की भूमिका का एहसास जरूर कराएंगे। इस इस्तीफे को वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की भूमिका

अखिलेश यादव, मोहम्मद आजम खां, माता प्रसाद पाण्डेय और शिवपाल सिंह यादव वरिष्ठ विधायक हैं। अब देखना होगा कि नेता विरोधी दल कौन होता है? सत्रहवीं विधानसभा में राम गोविंद चौधरी नेता विरोधी दल हुआ करते थे। विधानसभा का चुनाव हारने के बाद 11 मार्च 2022 को उनकी सदस्यता स्वतरू समाप्त हो गई है। इसलिए समाजवादी पार्टी को अब नए नेता विरोधी दल का चयन करना है। अखिलेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभाकर सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की भूमिका में दिख सकते हैं। अब देखना होगा कि वह स्वयं नेता विरोधी दल बनते हैं या किसी अन्य वरिष्ठ को बनाते हैं।

करहल सीट से पहली बार बने विधायक

अखिलेश करहल विधानसभा सीट से पहली बार विधायक चुने गए हैं। इस सीट को बचाए रखकर अखिलेश ने संदेश देने की कोशिश की है कि पारिवारिक व परंपरागत सीट से उनका सियासी लगाव है और बना रहेगा। आजम खां इस चुनाव में रामपुर से 10वीं बार विधायक चुने गए हैं और जेल में हैं। विधानसभा में उनकी भूमिका जेल से आने के बाद ही शुरू हो पाएगी। अखिलेश यादव वर्ष 2004 में पहली बार और दूसरी बार 2009 में कन्नौज से सांसद चुने गए। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा को पूर्ण बहुमत मिलने पर मुख्यमंत्री बनने के लिए अखिलेश ने कन्नौज संसदीय सीट से इस्तीफा दिया था। वह विधान परिषद सदस्य बनकर पांच साल मुख्यमंत्री रहे।

यूपी से दूरी बनाने के भी लगे आरोप

अखिलेश जब सांसद थे तो उनका ज्यादातर वक्त दिल्ली में गुजर रहा था। कई बार उन पर यूपी से दूरी बनाने के भी आरोप लगे। इस्तीफे के सहारे वह यह संदेश देना चाहते हैं कि विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद वो यूपी की सियासत पर ध्यान देंगे। समाजवादी पार्टी का आजमगढ़ की विधानसभा सीटों पर अच्छा प्रदर्शन रहा है। ऐसे में अखिलेश को भरोसा है कि उपचुनाव में यह सीट फिर से सपा के खाते में ही जाएगी। वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद अखिलेश केंद्र की राजनीति करने लगे थे। इसके बाद ऐसा माना गया कि यूपी में विपक्ष कमजोर पड़ गया है।

अब सपा के सिर्फ तीन सांसद

यूपी में लोकसभा की 80 सीटें हैं। इसलिए अखिलेश वर्ष 2024 के लिए सियासी जमीन को मजबूत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के पांच सांसद चुने गए थे। अखिलेश यादव आजमगढ़, मोहम्मद आजम खां रामपुर, शफीकुर्रहमान बर्क संभल, मुलायम सिंह यादव मैनपुरी और डा. एसटी हसन मुरादाबाद से सांसद चुने गए। अखिलेश और आजम खां के इस्तीफा देने के बाद अब उसके तीन सांसद बचे हैं।

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