वेलेंटाइन डेः एक थकी हुई और संघर्षहीन जाति न तो कभी प्रेम करती और न दूसरों को करने देती




शिव कुमार शौर्य

लखनऊ। आज 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे है। इस पर वाद-विवाद करना मेरा ध्येय नहीं औऱ न इसके औचित्य को सही या गलत ठहराने की कोई मंशा है। इस दिन को लेकर हमारा समाज दो भागों में बंटा हुआ दिखता है। कुछ लोग इसे पाश्चात्य प्रभाव बतलाते हुए इसे भारतीय संस्कृति पर हमला बतलाते हैं तो कुछ युवा पीढ़ी के लोग इसे एक स्वाभाविक आकर्षण मानते हैं। क्या इस प्रकार के उत्सव भारतीय संस्कृति पर हमला है? क्या युवा सौंदर्यबोध के प्रति भारतीय समाज कभी इतना असहज रहा है? उत्तर अगर हां है तो इसकी पड़ताल होनी चाहिए और नहीं है तो इतना बबेला क्यों? वैलेंटाइन डे से भारतीय समाज की घबराहट उन्ही लोगों में ज्यादा दिखती है जिनको प्राचीन भारत, भारतीय सूफीवाद व छायावाद की जानकारी नहीं। ऐसे उत्सवों के प्रति हमारी अनुदारता प्रदर्शित करती है कि हमारे समाज के एक बड़े हिस्से में कोई मनोवैज्ञानिक कुंठा है। प्राचीन भारतीय साहित्य इस बात का गवाह है कि हमारा देश कभी बंद समाज नहीं रहा है और प्राचीन इतिहास और मध्यकालीन सूफी साहित्य में प्रेम की बड़ी सारगर्भित व्याख्या प्रस्तुत की गई है।

उन्मुक्त प्रेम का महासागर है मालती माधव पुस्तक

प्राचीन भारत में ऐसा कोई भी ऐसा उपलब्ध सामाजिक -सांस्कृतिक फॉर्मेट नहीं था जिसे पूरे समाज ने प्रेम या सौंदर्यबोध के सम्बन्ध में अस्वीकार किया हो या उस दौर में ऐसा प्रदर्शन करने पर किसी से मारपीट की गई हो। वैदिक ऋचाओं से प्राचीन भारत की जो तस्वीर सामने आती है वह यह है कि भारत के लोग बड़े मस्त, जीवंत, और अद्भुत युवा सौंदर्यबोध से भरे पड़े थे जिनमे दैहिक संकीर्णता या अनुदारता लेशमात्र नहीं थी। भवभूति कृत मालती माधव से ज्ञात होता है कि समाज के हर वर्ग के लोग इन उत्सवों को कितनी उन्मुक्तता से मनाते थे। सारी पुस्तक उन्मुक्त प्रेम का महासागर है। हर्षवर्धन ने अपनी पुस्तक रत्नावली में युवक युवतियों के परस्पर सम्मिलन के ऐसे कई ब्योरे दिए हैं जिन्हें पढ़कर पता चलता है कि उस समय भारतीय संस्कृति इस देश और समाज के लिए कितने व्यापक और मुक्त हृदय की विषयवस्तु रही होगी।




खजुराहो के शिल्पियों को कौन भूला सकता

इस देश का इतिहास ऐसे अनेक उद्धरणों से भरा पड़ा है जहां दैहिक प्रेम अनुभूतियों का प्रस्फुटन साहित्य और शिल्प दोनों में ही हुआ है। खजुराहो के शिल्पियों को कौन भूला सकता है. यह अनायास ही प्रश्न उठता है कि क्या अपने युग में उन साहसी शिल्पियों को सृजन के वे जोखिम उठाने पड़े होंगे जो वर्तमान में कलाकार व साहित्यकार उठा रहे हैं? प्रश्न उठता है कि क्या गीतगोविन्द के रचयिता जयदेव ने राधा और कृष्ण के उन्मुक्त रति-चित्रण करते हुए किसी तरह के सामाजिक और सांस्थानिक प्रतिरोध का सामना किया होगा? क्या वह हमलों के शिकार हुए थे? इतिहास में इस तथ्य का कोई उल्लेख नहीं है।




सौंदर्य को पहचानने की शक्ति प्रेम

सूफीमत ने भारत में सबसे पहले यह बात कही कि अंतिम सत्य का पूर्ण रूप अगर देखना हो तो वह केवल सौंदर्य और प्रेम के रूप में ही दिख सकता है। प्रेम, सौंदर्य को पहचानने की शक्ति है। प्रेम, सौंदर्य पर न्यौछावर होने की योग्यता है। प्रेम वह शक्ति है जो जीव को उसके विरह की अनुभूति कराती है। प्रेम वह प्रेरणा है जो जीव को उस सत्ता से फिर से मिला देता है जो सृष्टि की जटिल प्रक्रिया के कारण उससे अलग हो जाती है। सूफीमत परमात्मा को साकार सौंदर्य और साधक को साकार प्रेम मानता है। इकबाल के शेर में साधक परमात्मा से कहता है कि यह कैसी स्थिति है कि सौंदर्य भी पर्दे में छिपा हुआ है और प्रेम भी आवरण के नीचे है। या तो तू खुद पर्दे से बाहर आ या फिर मेरे ऊपर से आवरण हटा दे।

हुस्न भी हो हिजाब में , इश्क भी हो हिजाब में,

या खुद आशकार हो, या मुझे आशकार कर।।

सौंदर्य से प्रेम और प्रेम से मुक्ति ये सूफीमत के सिद्धांतों का निचोड है। इसी प्रेम की सिद्धि के लिए सूफियों ने इश्क मिजाजी की छूट दी क्योंकि इश्क मिजाजी से इश्क हकीकी हासिल किया जा सकता है।

शगल बेहतर है इश्कबाजी का

क्या हकीकी का क्या मजाजी का।

इश्क उसी की झलक है ज्यों सूरज की धूप।

जहां इश्क तहां आपु हैं कादिर नादिर रूप।।

सब मजहब सब इल्म अरु सबै देश के स्वाद।

अरे इश्क के असर बिनु , ये सब हैं बरबाद।।

छायावादी वेदना प्रियता एक ओर तो कवियों की रोमांटिक मुद्रा का परिणाम है दूसरी ओर इसमें पहले से ही सूफियों की वेदना प्रियता काम कर रही थी। इस वेदना प्रियता का काम हिंदी में कबीरदास, मीरा, घनानन्द और बोधा ने किया और उर्दू में गालिब, मीर और खुसरो ने किया।

श्रृंगार में एक आनन्द का संचार

भारत में इस्लाम के आगमन ने हिंदुत्व को कोई दार्शनिक उड़ान नहीं दी, नए भाव और नए विचार नहीं दिये किन्तु भारतीय साहित्य के भावुकता पक्ष को जरूर गति प्रदान की। इसका एक उदाहरण एक सूफी संत खुसरो थे जिन्होंने श्रृंगार में एक आनन्द का संचार किया-

गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केश।

चल खुसरो घर आपने, रैन भई सब देश।।

कबीर ने प्रेम की बेचौनी और विरह की आतुरता जो वर्णन किया उससे हिंदी साहित्य में एक नई भावुकता जन्मी। उन्होंने परमात्मा को अपना पति मानकर विरह और मिलन की बेचौनी को अपने काव्य में इस प्रकार वर्णित किया-
सोवों तो सपने मिलें, जागों तो मन माहिं।

लोचन राता सुधि हरी, बिछुरत कबहुँ नाहिं।

लिखा लिखी की है नहीं, देखा देखी बात।

दूल्हा दुल्हन मिल गए, फीकी पड़ी बरात।

नैनों की करि कोठरी, पुतली पलंग बिछाय।

पलकों की चित डार के पिया को लिया रिझाय।

चूड़ी पटकों पलंग से, चोली लावों आगि।

जा कारन यह तन धरा, ना सूती गर लागि।

भारतीय भावुकता को कबीर ने इस्लामी भावुकता से मिश्रित कर जो प्रेम और विरह की धारा चलाई वही आगे चलकर महादेवी वर्मा के मुख से निकली-

अंखियन तो झाईं पड़ी, पंथ निहार निहार।

जिव्हा तो छाला पड़ा, नाम पुकार पुकार।

कै विरहन को मींच दे, कै आपा दिखराय।

आठ पहर को दाझना, मो पै सहा न जाय।।

नर नारी के सौंदर्यबोध को अगर सूफी संत उतने जोर से नहीं चलाते तो हिंदी साहित्य में सौंदर्य का गहरा भाव नहीं दिखता। प्रेम की जो पीड़ा प्रेमी ह्रदय की जो बेचौनी भारतीय साहित्य के लिए नई थी उसकी दिशा कबीर को सूफी काव्य से मिली।कबीर ने बिरह की जो बेचौनी दिखाई उसका उपयोग मीरा बाई ने भी किया।

दर्द की मारी बन बन डोलूँ वैद्य मिला न कोय।

मीरा के प्रभु पीर मिटै जब वैद्य सावलिया होय।

इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया।

दर्द की दवा पाई, दर्द बे दवा पाया।

कहते है जीते हैं उम्मीद पर लोग ,

हम को जीने की भी उम्मीद नहीं।।

गालिब

संस्कृति कोई जड़ नहीं अपितु जीवंत

संस्कृति कोई जड़ नहीं अपितु जीवंत भाव है। यह भाव किसी भी दौर में वह जड़ नहीं रहा। हर दौर में साहित्यकारों,कवियों और दार्शनिकों ने तत्कालीन श्सौंदर्य बोधश् को अपने अपने ढंग से प्रदर्शित किया है। किसी पक्ष पर हमलावर होकर संस्कृति की रक्षा करने का कोई उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलता जिनसे श्संस्कृति प्रेमीश् प्रायः प्रेरणा लेने की बात करते हैं। लोक और पारलौकिक जीवन के इन दोनों प्रारूपों को भारतीय संस्कृति ने बराबर स्थान प्रदान किया है। इसमें लौकिक और अलौकिक दोनों का बराबर स्थान है। लोगों को खुद अपनी जिन्दगी दो, जो जैसे जीना चाहता है उसे निरापद जीने दो।

एक थकी हुई और संघर्षहीन जाति न तो कभी प्रेम करती है और न दूसरों को करने देती है। न वह प्रेम से रहती है और न दूसरों को रहने देती है। जब जब समाज में प्रेम के जलस्त्रोत सूख जाते है तब तब समाज में घृणा के गुबार उठने लगते हैं। कोई व्यक्ति अपने अंदर के काम, क्रोध, मद,मोह, लोभ और बैर जैसे दुर्विकारों को पराजित कर के ही साहसी और बहादुर बन सकता है। अपनी प्रेयसी/प्रियतम का सच्चा प्रेमी अथवा अपने पूज्य का अनन्य उपासक होना किसी कायर के वश की बात नहीं है, ऐसा कोई बहादुर ही कर सकता है।

कबीरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं ।

सीस उतारे हाथि करि, सो पैसे घर मांहि ।।

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