लखनऊ। तीनों कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन को समर्थन देने में जुटे विपक्ष की रणनीति को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक झटके में समाप्त कर दिया है. बेशक आंदोलन ने पूरे प्रदेश को अपनी जद में न लिया हो, लेकिन राज्य के पश्चिम और तराई क्षेत्र की करीब 125 सीटों पर चुनावी दंगल तेज होने की संभावना जरूर थी. आखिरकार किसानों की मांग पर बड़ा दिल दिखाते हुए केन्द्र सरकार ने जो यू-टर्न लिया है, वह विपक्ष के हाथ से किसानों का मुद्दा छीनकर उल्टे पांव लौटा सकता है.
चंद माह बाद ही प्रदेश में विधान सभा का चुनाव होने जा रहा है. सत्ताधारी भाजपा के सामने सरकार बचाने तो लगातार चुनावों में हार देख रही सपा, बसपा और कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने का घोर संकट है. ऐसे में इन विरोधी दलों ने कानून व्यवस्था से लेकर महंगाई तक तमाम मुद्दों को सिक्के की तरह उछालकर देखा, लेकिन उससे जनता को उम्मीदों के मुताबिक शायद वह न जोड़ सके. इधर, केंद्र सरकार द्वारा करीब एक वर्ष पहले लागू किए तीन कृषि कानूनों का ही एकमात्र मुद्दा ऐसा रहा, जिस पर समूचे विपक्ष की आस जा टिकी. दिल्ली-यूपी की सीमा पर लगभग एक वर्ष से चल रहे आंदोलन के बहाने सभी दलों ने भाजपा सरकार को जबरदस्त घेरने की कोशिश की. सभी ने इन्हें काला कानून बताते हुए आंदोलन का भरपूर समर्थन दिया.
हांलाकि आंदोलनकारियों ने विपक्षी राजनैतिक दलों को अपना मंच साझा नहीं करने दिया, लेकिन इन पार्टियों के रणनीतिकारों ने इस मुद्दे पर ही चुनावी बिसात बिछाना ज्यादा उचित समझा. कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने किसान पंचायतें कीं तो समाजवादी पार्टी ने किसान पटेल यात्रा प्रदेश में निकाली. बसपा प्रमुख मायावती भी कृषि कानूनों को वापस लिए जाने मांग लगातार दोहराती रहीं.
वहीं राजनैतिक प्रेक्षकों का मानना हैं कि इन तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदेश में आंदोलन तमाम प्रयासों के बाद भी विस्तार नहीं ले सका, लेकिन पश्चिम और तराई क्षेत्र में भाजपा के लिए राह कठिन जरूर लगने लगी थी. मेरठ, मुजफ्फरनगर, हापुड़, मुरादाबाद, सहारनपुर, बागपत, शामली, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी आदि जिलों की लगभग 125 सीटों पर विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने का भरपूर मौका दे दिया. ज्यों-ज्यों चुनाव तेजी पकड़ता, वैसे-वैसे यह पार्टियां कृषि कानूनों पर चर्चा के सहारे कानून व्यवस्था, महंगाई आदि की चर्चा कर माहौल खराब कर सकते थे. अब कानूनों को वापस लेने से चुनाव में यह मुद्दा ही नहीं रहेगा. भाजपा किसान मोर्चा के महामंत्री घनश्याम पटेल का मानना है कि पार्टी किसी लाभ-हानि के लिए काम नहीं करती है बल्कि देश हित के लिए काम करती है. प्रधानमंत्री ने कृषि कानूनों को वापस लेकर आंदोलनजीवियों को करार जवाब दिया है. विपक्ष के पास सरकार के खिलाफ को कोई मुद्दा नहीं है वह तो आंदोलन जीवी के साथ मिलकर घेरने का असफल प्रयास कर चुकी है. जिससे सरकार ने एक झटकेे में समाप्त कर दिया.

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