श्री आशुतोष महाराज जी
| संस्थापक | दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान |
आजमगढ़। देश में शक्तिपूजन की कई विद्याएं है जो श्रद्धालुओं ने अपनी
आस्था के आधार पर निर्मित की है। इनमें से एक है आदि शक्ति के पूजन-दिवसों
यानी नवरात्रों में किए जाने वाला व्रत का सामान्य अर्थ संकल्प या
दृढ़निश्चय होता है। नवरात्र के व्रत का मतलब तामसिक-राजसिक को त्यागकर
सात्विक आहार विहार व्यवहार अपना कर आदि शक्ति की आराधना करना है। उक्त
विचार दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संरक्षक स्वामी प्रभाकर नन्द ने
विशेष बातचीत के दौरान व्यक्त की। उन्होंने कहा कि शक्ति पूजन का अवसर वर्ष
में दो बार आता है। इसलिए यह सोचने का विषय है क्यों इन्हीं दिनों में
अन्न त्याग कर फलाहार या अन्य सात्विक खाद्य पदार्थो को ग्रहण किया जाता
है। पहली नवरात्र चैत्रमास में तथा दूसरी अश्विन मास में आती है। ये दोनों
वे बेलाएं है जब दो ऋतुओं का संधिकाल होता है। ऋतुओं के संधिकाल में
बीमारियां होने की संभावना काफी बढ़ जाती है यही कारण है कि संधिकाल के
दौरान संयमपूर्वक व्रतों को अपनाया जाए तो इससे बहुत सी बीमारियों से बचाव
होता है।
नवरात्र के व्रत से होने वाले स्वास्थ्य लाभ:
शरीर
का विषहरण: नवरात्र में निराहार रहने या फलाहार करने से शरीर के विषैले
तत्व बाहर निकल आते हैं और पांचन तंत्र को आराम मिलता है।
बीमारियों
से बचाव: कई ऐसे रोग हैं, जिनसे व्रतों में सहज ही रक्षा हो जाती है। जैसे
मोटापे पर नियंत्रण, दिल की बामारियों व कैंसर से बचाव क्योंकि फलाहार,
फलों का रस एवं बिना तला-भुना भोजन विषय व वसा युक्त होता है।
मानसिक
तनाव पर नियंत्रण: जब व्रतों द्वारा विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते है तो
लसिका प्रणाली दुरूस्त होती है। रक्त संचार बेहतर हो जाता है। हदय की कार्य
प्रणाली में सुधार होता है। इससे मानसिक शक्ति बढ़ती है। तनाव कम होने लगता
है।
आंतरिक अंगों का सिंचन: व्रत में खाना कम व पानी ज्यादा
पीने से शरीर के भीतरी अंगों का सूखापन दूर होता है। अंग प्रत्यंग व त्वचा
री हाइड्रेट यानी उनकी सिंचाई हो जाती है। पाचन तंत्र भी बलिष्ठ होता है।
शरीर
और मन का सौन्दर्यीकरण: नौ दिनों के व्रत में दिनचर्या व खानपान में इतना
बदलाव आता है कि उसका असर आपकी त्वचा पर भी पड़ता है। विशेषकर फलों व मेवों
के सेवन से इसका सीधा सम्बंध हमारे शरीर में घटती रासायनिक प्रक्रिया से
जुड़ता है। इसके अलावा तरल पदार्थो व पानी की अधिकता से और आंतों के साफ
रहने से भी शरीर और त्वचा में सहज की कांति आती है।
उपयुक्त विश्लेषण से हमें पता चलता है कि नवरात्र व अन्य पर्वो में व्रत रखना कैसे शारीरिक व मानसिक स्तर पर लाभ प्रदान करता है। इसलिए आप भी अपनी सेहत के अनुसार नवरात्र में व्रत कर सकते है। साथ ही, पूर्ण सतगुरू से ब्रहमज्ञान प्राप्त कर, ईश्वर की ध्यान-साधना करें ताकि महाशक्ति की इन विशेष रात्रियों में हमारा आत्मिक उत्थान भी हो सके, हम देवी मां की शाश्वत भक्ति को प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बना सके।
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