पूर्वांचल विश्वविद्यालय की तुलना में स्नातकोत्तर का परीक्षा शुल्क 615 रुपये अधिक, समर्थ पोर्टल के नाम पर भी लिए जा रहे 300 रुपये; शुल्क निर्धारण की पारदर्शिता और शासनादेश के पालन की मांग
आजमगढ़। महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ की शुल्क व्यवस्था को लेकर विद्यार्थियों के हितों से जुड़े सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि विश्वविद्यालय में परीक्षा शुल्क और समर्थ पोर्टल के नाम पर विद्यार्थियों से अतिरिक्त धनराशि ली जा रही है। इसको लेकर छात्र संगठनों और विद्यार्थियों ने शुल्क निर्धारण की पारदर्शिता, शासनादेश के पालन और अतिरिक्त शुल्क की समीक्षा की मांग उठाई है।
महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय की स्थापना वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर से आजमगढ़ और मऊ जिलों को अलग कर की गई थी। विश्वविद्यालय की स्थापना के समय दोनों विश्वविद्यालयों के अधिनियमों और परिनियमावली से जुड़े प्रावधानों को लेकर जो व्यवस्था तय की गई थी, उसी के आधार पर अब शुल्क संरचना में अंतर पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि जब दोनों विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था के कई आधार समान हैं तो शुल्क में इतना अंतर क्यों है?
उपलब्ध कराए गए शुल्क विवरण के अनुसार, पूर्वांचल विश्वविद्यालय में स्नातक का परीक्षा शुल्क 1,000 रुपये और स्नातकोत्तर का 1,200 रुपये है। इसके अलावा प्रथम वर्ष में 200 रुपये नामांकन शुल्क लिया जाता है। समर्थ पोर्टल के नाम पर अलग से कोई शुल्क नहीं लिया जा रहा है।
इसके विपरीत महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय में स्नातक का परीक्षा शुल्क 1,000 रुपये और स्नातकोत्तर का 1,815 रुपये बताया गया है। यहां भी प्रथम वर्ष में 200 रुपये नामांकन शुल्क के साथ समर्थ पोर्टल के नाम पर 300 रुपये अतिरिक्त लिए जा रहे हैं। इस प्रकार स्नातकोत्तर के विद्यार्थियों को पूर्वांचल विश्वविद्यालय की तुलना में 615 रुपये अधिक परीक्षा शुल्क देना पड़ रहा है। समर्थ पोर्टल के शुल्क को जोड़ने पर विद्यार्थियों पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है।
छात्रों के सामने उठ रहे ये सवाल
विद्यार्थियों का सवाल है कि समर्थ पोर्टल के संचालन के लिए 300 रुपये किस आधार पर लिए जा रहे हैं? क्या यह शुल्क शासन या सक्षम प्राधिकारी से स्वीकृत है? यदि पोर्टल विश्वविद्यालय की शैक्षणिक और परीक्षा संबंधी प्रक्रिया का हिस्सा है तो इसके लिए अलग शुल्क लेने की आवश्यकता और औचित्य क्या है? इसी तरह स्नातकोत्तर के परीक्षा शुल्क में अंतर का आधार भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
इस संबंध में शिब्ली कालेज के पूर्व छात्रसंघ महामंत्री नुरूल हुदा का कहना है कि विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में ग्रामीण और सामान्य आर्थिक स्थिति वाले परिवारों के विद्यार्थी पढ़ते हैं। उनके लिए परीक्षा और अन्य शुल्कों में थोड़ी-सी वृद्धि भी परेशानी का कारण बनती है। ऐसे में शुल्क निर्धारण करते समय विद्यार्थियों की आर्थिक स्थिति और शिक्षा तक उनकी पहुंच को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
शुल्क संरचना सार्वजनिक करने की मांग
उन्होंने मांग की है कि विश्वविद्यालय प्रशासन सभी पाठ्यक्रमों की शुल्क संरचना, परीक्षा शुल्क, नामांकन शुल्क और समर्थ पोर्टल शुल्क का पूरा विवरण आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि प्रत्येक मद में ली जा रही धनराशि किस शासनादेश, अधिनियम या सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के आधार पर निर्धारित की गई है। शासनादेश में परीक्षा शुल्क की अधिकतम सीमा 800 से 1,000 रुपये बताए जाने का दावा भी किया जा रहा है। हालांकि, इस सीमा और विश्वविद्यालय की वर्तमान शुल्क व्यवस्था की वैधानिक स्थिति की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। विश्वविद्यालय प्रशासन को इस संबंध में संबंधित शासनादेश और स्वीकृति आदेश सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
उन्होंने कहाकि शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है, न कि अनावश्यक आर्थिक बोझ डालना। इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन को शुल्क संरचना की समीक्षा कर विसंगतियों को दूर करना चाहिए। यदि किसी मद में निर्धारित नियमों से अधिक शुल्क लिया जा रहा है तो उसकी जांच कर उचित कार्रवाई की जाए और विद्यार्थियों के हित में आवश्यक सुधार किया जाए। इस संबंध मंे जब विश्वविद्यालय के प्रवक्ता डा. प्रवेश कुमार सिंह से संपर्क किया गया है तो उन्होंने कहा कि आजमगढ़ विश्व विद्यालय पूर्वाचल विश्व विद्यालय के बाइलाज से ही चल रहा है। छात्रों से निर्धारित फीस ली जा रही है।

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