यूपी निकाय चुनाव में बीजेपी के लिए परिवारवाद बना बड़ी चुनौती...

टिकट के लिए कतार में ये दिग्गज नेता


लखनऊ।
यूपी निकाय चुनाव की तैयारी में जुटी बीजेपी के लिए परिवारवाद को रोकना बड़ी चुनौती दिखाई पड़ रहा है। इसकी वजह ये कि बीजेपी के कई मंत्री व दिग्गज नेता अपनी पत्नी और बच्चों के लिए टिकट के कतार में लगे हुए हैं। निकाय चुनाव की अधिसूचना के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ ने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई थी। तब भी ये कहा गया था कि मंत्री अपने परिवार के लिए टिकट में न लगें। बीजेपी सरकार और संगठन ने निकाय चुनाव में परिवारवाद रोकने के लिए मंत्री, सांसद और विधायकों के रिश्तेदारों को टिकट नहीं देने का फैसला किया है।

लेकिन निकाय चुनाव में जीत के मूल मंत्र के साथ मैदान में उतरी बीजेपी के लिए परिवारवाद को रोकना आसान नहीं होगा। सरकार के मंत्रियों से लेकर कई सांसद व नेता तक निकाय चुनाव में परिजनों के जरिए राजनीतिक विरासत को बढ़ाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। प्रयागराज में औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी की पत्नी अभिलाषा नंदी दूसरी बार महापौर बनी हैं। सूत्रों की मानें तो मंत्री नंदी अपनी पत्नी अभिलाषा को तीसरी बार महापौर बनवाने के लिए टिकट की मांग कर रहे हैं। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक टिकट के लिए पूरी ताकत लगा दी है। निकाय चुनाव की अधिसूचना के बाद अभिलाषा गुप्ता ने डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, पूर्व डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा समेत संगठन और सरकार के कई लोगों से मुलाकात की है।

लखनऊ की बात करें तो उत्तर सीट से विधायक नीरज बोरा अपनी पत्नी बिंदु बोरा के लिए टिकट मांग रहे हैं। चुनाव की अधिसूचना के पहले तो शहर भर में बिंदु बोरा के बतौर समाज सेविका होर्डिंग और बोर्ड दिखने लगे थे। आचार संहिता के चलते अब ये बोर्ड तो हट गए लेकिन सूत्रों की मानें तो मेयर के टिकट का प्रयास जारी है। निवर्तमान महापौर संयुक्ता भाटिया अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए पुत्रवधू रेशू भाटिया के लिए टिकट की मांग कर रही हैं। महापौर की दौड़ में पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा की पत्नी का भी नाम भी काफी चर्चा में है।

2021 के पंचायत चुनाव में भी बीजेपी ने किसी मंत्री, सांसद या विधायक के परिजनों को टिकट न देने का फैसला सख्ती से लागू किया था। लेकिन कई जगह पर नेताओं के परिजन ने बगावत कर पर्चा दाखिल कर दिया। उसके बाद क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पार्टी को फैसला बदलना पड़ा। तब कई तत्कालीन मंत्रियों, विधायक और सांसद के परिजन ब्लाक प्रमुख, जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए।

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