आजमगढः शुभ संयोगों के बीच सावन मास शुरू, शिवालयों में गूंजा हर-हर महादेव



आजमगढ़। भगवान शिव के प्रिय सावन मास की शुरुआत 14 जुलाई दिन गुरूवार से हो गई है। इस बार सावन मास में चार सोमवार, पांच गुरूवार और पांच ही शुक्रवार होने से ये महीना शुभदायी होगा। सावन मास के पहले दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र पूरे दिन रहेगा। वहीं सूर्याेदय से रात 10 बजकर 24 मिनट तक सौम्य नामक औदायिक योग है। यह सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा। सावन मास का समापन 12 अगस्त को होगा। इस दिन धनिष्ठा नक्षत्र व सौभाग्य योग और धाता नामक औदायिक योग होने से सुख और संपन्नता में वृद्धि होगी। इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व भी मनाया जाएगा।

मान्यताओं के अनुसार सावन मास में सोमवार का विशेष महत्व है। सोमवार को भगवान शिव का दिन माना गया है। सावन मास में भगवान आशुतोष की पूजा का विशेष महत्व है। जो भक्त वर्ष भर प्रतिदिन नियमपूर्वक पूजा न कर सकें, उन्हें सावन मास में शिव पूजा और व्रत रखना चाहिए। सावन महीने में जितने भी सोमवार होते हैं, उन सब में शिवजी का व्रत किया जाता है। श्रावण मास में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शिवालयों में पहुंचते हैं। ऐसे में शिवालयों में तैयारियां की जा रहीं हैं।

18 जुलाई को सावन मास का प्रथम सोमवार है। इस दिन पूर्वा भाद्रपद और उत्तराभाद्र नक्षत्र का सुयोग और चंद्रमा की स्थिति मीन राशि है। राशि स्वामी बृहस्पति देव रहेंगे। शोभन योग होने से इस दिन का व्रत शुभता की अभिवृद्धि करने वाला रहेगा। पूर्व पापों का उपशमन करके सद्गुणों की ओर ले जाने वाला है। 25 जुलाई को सावन मास का दूसरा सोमवार है। इस दिन मृगशिरा नक्षत्र संपूर्ण दिन और रात्रि शेष तक है। राशि स्वामी शुक्र और बुध दोनों ही हैं। ये दोनों ही ग्रह शुभ हैं। वहीं इस दिन आनंद नामक औदायिक योग भी है। ऐसे में इस दिन का व्रत धर्म और अर्थ के क्षेत्र में अभ्युदय प्रदान करने वाला रहेगा।

एक अगस्त को सावन मास का तीसरा सोमवार है। इस दिन पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी दोनों नक्षत्रों का सुयोग है। चंद्रमा की स्थिति कन्या राशि है और राशि स्वामी व्यापार में वृद्धि करने वाले बुध ग्रह हैं। इस दिन ध्वज नामक औदायिक योग है। यह चतुर्दिक उन्नति के साथ धान्यादि में वृद्धि कारक रहेगा। साथ ही व्यापार में आने वाली बाधाओं का निराकरण करने वाला रहेगा। सावन मास का चौथा सोमवार आठ अगस्त को है। इस दिन ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र की स्थिति है। नक्षत्र स्वामी भौम और बृहस्पति दोनों है। लेकिन, सोमवार के दिन प्रातरू काल ज्येष्ठा नक्षत्र होने से पद्म नामक औदायिक योग है। इस दिन का व्रत सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहेगा। इस दिन के व्रत से चतुर्थ पुरुषार्थ सहित समस्त कामनाओं की संपूर्ति होगी। यह आध्यात्मिक सोच को भी विकसित करने वाला रहेगा।

ज्योतिर्विद पंडित संदीप उपाध्याय के अनुसार, श्रावण में एक महीने तक शिवालयों में स्थापित, प्राण प्रतिष्ठित शिवलिंग या धातु से निर्मित शिवलिंग का गंगाजल व दुग्ध से रुद्राभिषेक करें। यह शिव को अत्यंत प्रिय है। वहीं उत्तरवाहिनी गंगाजल, पंचामृत का अभिषेक भी महाफलदायी है। कुशोदक (ऐसा जल जिसमें कुश घास की पत्तियां डाली गईं हों) से व्याधि शांति, जल से वर्षा, दही से पशुधन, ईख के रस से लक्ष्मी, मधु से धन, दूध से एवं एक हजार मंत्रों सहित घी की धारा से भगवान शिव का अभिषेक करने से पुत्र व यश वृद्धि होती है।

पंडित राजेश मिश्रा के अनुसार, सावन मास में सोमवार ‘सोमवारी व्रत रोटका’ भी कहलाता है। इसे सोम या चंद्रवार भी कहते हैं। यह दिन भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। मंगलवार को मंगलागौरी व्रत, बुधवार को बुध गणपति व्रत, बृहस्पतिवार को बृहस्पति व्रत, शुक्रवार को जीवंतिका देवी व्रत, शनिवार को बजरंगबली व नरसिंह व्रत और रविवार को सूर्य व्रत होता है। प्रतिपदा के स्वामी अग्नि, द्वितीया के ब्रह्मा, तृतीया के गौरी, चतुर्थी के गणनायक, पंचमी के सर्प, षष्ठी के स्कंद, सप्तमी के सूर्य, अष्टमी के शिव, नवमी के दुर्गा, दशमी के यम, एकादशी के स्वामी विश्वदेव, द्वादशी के भगवान श्रीहरि, त्रयोदशी के कामदेव, चतुर्दशी के शिव, अमावस्या के पितर और पूर्णिमा के स्वामी चंद्रमा हैं।

प्रतिपदा के अशून्यन व्रत, द्वितीया के औदुंबर व्रत, तृतीया को गौरी व्रत, चतुर्थी को दूर्वा गणपति व्रत, पंचमी को उत्तम नाग पंचमी व्रत, षष्ठी को सूपोदन व्रत, सप्तमी को शीतला व्रत, अष्टमी और चतुर्दशी को शिव व्रत, नवमी को नक्त व्रत, दशमी को आशाव्रत, एकादशी को भगवान श्रीहरि व्रत, द्वादशी को श्रीधर व्रत, त्रयोदशी को प्रदोष व्रत, अमावस्या को पिठोरा व्रत, पूर्णिमा को उत्सर्जन, उपाकर्म, सभाद्वीप, रक्षाबंधन, श्रावणी पूर्णिमा सहित कई व्रत होते हैं।

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