लखनऊ। 18वीं विधानसभा चुनाव के रण में पिछड़ी जाति के दिग्गज नेताओं का असल इम्तिहान इस बार पूर्वांचल में होगा। सपा और भाजपा से जुड़े पिछड़े वर्ग के कई ऐसे नेता है जो अपनी-अपनी जाति के वास्तविक नेता होने का दावा करते रहे हैं। इनमें एकाध को छोड़ कर ज्यादातर बतौर प्रत्याशी मैदान में भी उतर चुके हैं। इनमें कई नेता ऐसे हैं जो वर्ष 2017 के चुनाव में भाजपा के साथ थे लेकिन इस अब साइकिल की सवार कर रहे हैं। पूर्वांचल में इस बार अनुप्रिया पटेल, डॉ. संजय निषाद, ओमप्रकाश राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान जैसे पिछड़े वर्ग के चेहरे की अग्नि परीक्षा होगी।
पिछले चुनाव में सुभासपा को मिली थी चार सीट पर विजयश्री
वर्ष 2002 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने इस पार्टी का गठन किया था। पहले बार सुभासपा को पिछले चुनाव में चार सीट पर विजयश्री मिली थी। दरअसल गठबंधन के तहत भाजपा ने सुभासपा को 8 सीटें दी थीं। इनमें से चार पर वह विजयी रहा और आठों सीटों पर 34.14 फीसदी वोट मिला था। लेकिन इस बार सुभासपा ने पाला बदलकर सपा के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ रही है। माना जाता है कि ओमप्रकाश की पूरी सियासत राजभर के अलावा बिंद, कुम्हार, प्रजापति, कुशवाहा, कोइरी जैसी पिछड़ी जातियों पर केंद्रित है और इन्हीं जातियों से जुड़े मुद्दे उठाकर मैदान में उतरते रहे हैं।
वाराणसी में बेटे अरविंद राजभर पर लगाया दांव
इस बार ओमप्रकाश और उनके बेटे अरविंद राजभर भी चुनाव मैदान में हैं। अरविंद को प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की शिवपुर सीट से योगी सरकार में मंत्री व सजातीय नेता अनिल राजभर के खिलाफ उतारा गया है। एक ही जाति का होने के चलते दोनों नेताओं की कड़ी परीक्षा होगी। वहीं, ओमप्रकाश जहूराबाद मे भाजपा के कालीचरण राजभर व सपा सरकार में मंत्री रहीं बसपा उम्मीदवार शादाब फातिमा से त्रिकोणीय मुकाबले में फंस गए हैं। सपा ने सुभासपा को 18 सीटें दी हैं। यानी पिछली बार की तुलना में इस बार उनकी कठिन अग्निपरीक्षा होगी।
संजय निषाद पर ताकत दिखाने की जिम्मेदारी
खुद को निषादों के नेता के रूप में प्रचारित करने वाले भाजपा के सहयोगी डॉ. संजय निषाद का दावा है कि 403 में से 160 सीटों पर निषादों का प्रभाव है। इनमें से अधिकांश सीट पूर्वांचल में ही हैं। कोई भी दल उनके सहयोग के बिना चुनाव नहीं जीत सकता। हालांकि पिछले चुनाव में संजय निषाद ने पार्टी के सिंबल पर 72 उम्मीदवार उतारे थे, मगर सिर्फ 3.58 फीसदी वोट ही हासिल कर सके। उनकी पार्टी एकमात्र सीट ज्ञानपुर ही जीतने में कामयाब रही। हालांकि कहा जाता है कि यह जीत भी बाहुबली विजय मिश्रा ने अपने बल पर जीता था। इस बार निषाद पार्टी को भाजपा ने 16 सीटें दी हैं। इन पर कामयाबी हासिल करने के लिए संजय निषाद को कड़ी परीक्षा से गुजरना होगा।
कुर्मी बहुल सीटों पर अनुप्रिया पटेल की परीक्षा
पूर्वांचल में कुर्मी जाति की काफी संख्या है और अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया को ही इनका सर्वमान्य नेता माना जाता है। 2017 के चुनाव में अनुप्रिया की पार्टी 11 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और उसके 9 प्रत्याशी जीते थे। अपना दल को 11 सीटों पर 39.21 फीसदी वोट मिले थे। इस बार अपना दल को हिस्सेदारी में 17 सीट मिली है। इसलिए अनुप्रिया के सामने इन सभी सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों को जिताने के अलावा उन सीटों पर भाजपा को भी चुनाव जिताने की चुनौती होगी, जिन पर कुर्मी मतदाता अधिक हैं।
स्वामी प्रसाद, दारा व कृष्णा के सामने भी होगी चुनौती
पिछले चुनाव में भाजपा का साथ पाकर चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान को भी अग्नि परीक्षा देनी होगी। दोनों नेता इस बार सपा के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में हैं। वहीं अपना दल (कमेरावादी) की अध्यक्ष कृष्णा पटेल व उनकी बेटी पल्लवी पटेल भी सपा के साथ चुनाव लड़ रही हैं। तीनों नेताओ भी इस चुनाव में खुद के साथ अपने सजातीय उम्मीदवारों को चुनाव जिताने की चुनौती है।
0 Comments