करीब 60 सीटों पर पासी बिरादरी की अहम भूमिका, कुर्मी मतदाताओं के प्रभाव वाली सीटों पर भी मुकाबला; दोनों दलों की सोशल इंजीनियरिंग पर टिकी निगाहें
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच कुर्मी और पासी बिरादरी को अपने साथ जोड़ना भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) की रणनीति का अहम हिस्सा बनता दिख रहा है। भाजपा जहां अपने परंपरागत गैरयादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक को बनाए रखने की चुनौती से जूझ रही है, वहीं सपा इन वर्गों में अपनी पकड़ बढ़ाकर सत्ता तक पहुंचने की रणनीति बना रही है। ऐसे में दोनों दलों के टिकट वितरण में इन बिरादरियों को प्राथमिकता मिलने के संकेत हैं।
राजनीतिक समीकरणों के आकलन के मुताबिक, करीब आठ प्रतिशत आबादी वाली कुर्मी बिरादरी प्रदेश की कई दर्जन विधानसभा सीटों पर हार-जीत को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। वहीं करीब चार प्रतिशत आबादी वाली पासी बिरादरी भी लगभग 60 सीटों पर अहम भूमिका निभा सकती है। यही वजह है कि दोनों दलों की रणनीति में इन वर्गों का महत्व बढ़ गया है।
सपा की नई सोशल इंजीनियरिंग पर जोर
सपा आगामी चुनाव में नए जातीय समीकरणों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। पार्टी की रणनीति मुस्लिम-यादव आधार के साथ गैरयादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वर्गों में अपना समर्थन बढ़ाने की है। इसी कड़ी में कुर्मी बिरादरी को पहली और पासी बिरादरी को दूसरी प्राथमिकता देने की योजना बताई जा रही है।
इसके अलावा पाल, गुर्जर और सैनी सहित अन्य पिछड़ी जातियों तथा दलित बिरादरियों को भी टिकट के जरिए साधने की कोशिश हो सकती है। वर्ष 2014 के बाद से इन वर्गों के बड़े हिस्से का झुकाव भाजपा की ओर रहा है। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने इन समुदायों के उम्मीदवारों को टिकट देकर अपने सामाजिक आधार का विस्तार करने का प्रयास किया था।
सपा के सामने चुनौती इस प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव में दोहराने की होगी। इसके लिए उसे केवल टिकट वितरण ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर संगठन, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और जातीय समीकरणों के बीच तालमेल भी बैठाना होगा।
भाजपा के सामने वोट बैंक बचाने की चुनौती
भाजपा वर्ष 2014 से अगड़ी जातियों, गैरयादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को जोड़कर व्यापक सामाजिक आधार बनाने की रणनीति पर काम करती रही है। पार्टी के लिए अब चुनौती इस गठजोड़ को मजबूत बनाए रखने की है। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा ने भाजपा के सामाजिक आधार के कुछ हिस्सों में अपनी पैठ बढ़ाई थी।
राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार, भाजपा के सामने यादव, मुस्लिम और जाटव मतदाताओं के एक बड़े हिस्से के विपक्षी दलों के पक्ष में एकजुट होने की चुनौती रहती है। ऐसे में कुर्मी और पासी मतदाताओं का समर्थन उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी कारण भाजपा भी गैरयादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वर्गों को बड़ी संख्या में टिकट देने के विकल्प पर विचार कर सकती है। हालांकि, टिकटों के अंतिम बंटवारे को लेकर अभी औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
विधायकों की संख्या में दिखा प्रभाव
प्रदेश की राजनीति में कुर्मी और पासी बिरादरी का प्रभाव केवल आबादी के अनुपात से नहीं, बल्कि चुनावी प्रतिनिधित्व से भी आंका जाता रहा है। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार, 2017 के विधानसभा चुनाव में 17 यादव विधायकों की तुलना में 34 कुर्मी विधायक निर्वाचित हुए थे। इसी चुनाव में करीब चार प्रतिशत आबादी वाली पासी बिरादरी से 15 विधायक चुने गए, जबकि मुस्लिम विधायकों की संख्या 24 रही।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कुर्मी विधायकों की संख्या बढ़कर 40 और पासी विधायकों की संख्या 25 हो गई। इसी दौरान 25 यादव विधायक निर्वाचित हुए। ये आंकड़े बताते हैं कि इन समुदायों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रभाव प्रदेश की चुनावी रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
उम्मीदवारों के चयन से बदलते जातीय समीकरण
गैरयादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वर्गों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आकांक्षा बढ़ने के साथ उम्मीदवारों के चयन का महत्व भी बढ़ा है। कई सीटों पर मतदाताओं की पसंद स्थानीय उम्मीदवार की जातीय पहचान, क्षेत्र में पकड़ और राजनीतिक दल के प्रति समर्थन जैसे कारकों से प्रभावित हो सकती है।
2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार, सपा ने 12 कुर्मी उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें से सात चुनाव जीतने में सफल रहे। भाजपा ने पांच कुर्मी उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से तीन को जीत मिली। ये नतीजे दोनों दलों के लिए उम्मीदवार चयन के महत्व को रेखांकित करते हैं, हालांकि केवल इन आंकड़ों के आधार पर पूरे समुदाय के मतदान रुझान का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
आगामी विधानसभा चुनाव में कुर्मी और पासी बिरादरी को कितनी सीटों पर टिकट मिलता है और उनके उम्मीदवारों को कितना समर्थन हासिल होता है, यह दोनों दलों की चुनावी रणनीति के असर को समझने में अहम होगा। फिलहाल इन समुदायों को साधने की कोशिशों के बीच टिकट वितरण और स्थानीय समीकरणों पर राजनीतिक निगाहें टिकी हैं।

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