शिव कुमार शौर्य
लखनऊ। सरोजिनी नायडू का जिक्र आते ही एक ऐसी महिला की छवि उभरकर सामने आती है जो कई भाषाओं में महारत रखती थी। जिसकी लिखी कविताएं हर तरफ धूम मचाती थीं। जिसकी सुरीली आवाज की वजह से महात्मा गांधी ने उसे भारत कोकिला की उपाधि दी थी। सरोजिनी नायडू की छवि केवल यहां तक ही सीमित नहीं है बल्कि स्घ्वतंत्रता सेनानी के तौर पर भी उनकी छवि काफी अहम रही थी।
हैदराबाद के बंगाली परिवार में हुआ जन्म
13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में बंगाली परिवार में पैदा हुई सरोजिनी को इन सबके साथ देश के किसी राज्य की पहली महिला गवर्नर होने का भी गौरव प्राप्त है। वह अपने आठ भाई बहनों में सबसे बड़ी थीं। उनके भाई हरिंद्रनाथ भी एक कवि थे। इसके अलावा उनकी मां सुंदरी देवी की बंगाली भाषा में कविता लिखती थीं। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्घ्याय एक वैज्ञानिक थे।
मिकी माउस कहने पर बापू ने कभी नहीं किया एतराज
बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि सरोजिनी को महात्मा गांधी प्यार से बुलबुल बुलाते थे। गांधीजी भी अपने पत्रों में उनके लिए ‘डियर बुलबुल’,’डियर मीराबाई’ तो यहां तक कि कभी-कभी मजाक में ‘अम्माजान’ और ‘मदर’ भी लिखते थे। 8 अगस्त 1932 को लिखे एक पत्र में गांधी जी ने सरोजिनी को इसी नाम से संबोधित किया था। इस खत में बापू ने खुद को लिटिल मैन (Little Man) लिखा था। दरअसल, कहीं कहीं पर सरोजिनी ने महात्मा गांधी को मिकी माउस लिटिल मैन लिखा था जिस पर बापू ने कभी कोई एतराज नहीं जताया था। बापू के जीवन पर लिखी गई डोन बायर्न की एक किताब मैन एंड हिज मैसेज के मुताबिक ब्रिटिश मीडिया ने उन्हें ये नाम उनके छोटे कद और बड़े कानों की वजह से दिया था। इसके अलावा इसके पीछे महात्मा गांधी का खान-पान भी था।
10वीं की क्लास में किया था टॉप
सरोजिनी ने 12 वर्ष की की आयु में 10वीं की क्लास में टॉप किया था। उनकी विलक्षण प्रतिभा को देखते हुए ही उन्घ्हें हैदराबाद के निजाम कॉलेज में एडमिशन मिला। इसके बाद यहां से हैदराबाद के निजाम ने उन्हें अपने खर्च पर पढ़ाई के लिए लंदन के किंग्स कॉलेज भेजा था। इसके बाद उन्हें कैम्ब्रिज के गिरटन कॉलेज में अध्ययन करने का मौका मिला। हालांकि कविता लिखने का उनका शौक न तो कभी खत्म हुआ और न ही कभी कम हुआ। गोल्डन थ्रैशोल्ड उनका पहला कविता संग्रह था। उनके दूसरे तथा तीसरे कविता संग्रह बर्ड ऑफ टाइम तथा ब्रोकन विंग ने उन्हें एक सुप्रसिद्ध कवयित्री बना दिया।
विचारों से प्रभावित होकर हो गई समर्पित
गांधी जी के ऐसे व्यक्तित्व से सरोजिनी नायडू बहुत प्रभावित हुईं और गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर ही वे देश के लिए समर्पित हो गईं। उन्होंने एक कुशल सेनापति के रूप में अपनी प्रतिभा का परिचय सत्याग्रह और संगठन में भी दिया उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व किया और जेल भी गयीं यहां पर ही उनकी मुलाकात डॉक्टर पीजी नायडू से हुई। उनकी शादी इंटरकास्ट थी। यह उस समय की बात है जब इस तरह का सोचना भी पाप माना जाता था। लेकिन सरोजिनी ने आगे बढ़ने का फैसला लिया और शादी के बाद सरोजिनी नायडू बन गईं। हालांकि उनकी शादी से दोनों ही परिवारों को कोई एतराज नहीं था। उनके पति मूल रूप से आंध्र प्रदेश के थे।
ब्रिटेन में गांधी जी से मिली थी पहली बार
बहुत कम लोग जानते हैं कि गांधीजी से सरोजिनी नायडू की पहली मुलाकात इंग्लैंड में हुई थी। ये 1914 की बात है गांधी जी अपने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह के चलते प्रसिद्ध हो चुके थे सरोजिनी नायडू उस समय इंग्लैंड में थीं। जब उन्होंने सुना कि गांधीजी भी इंग्लैंड में हैं, तब वो उनसे मिलने गईं। उन्होंने देखा कि गांधीजी जमीन पर कंबल बिछाकर बैठे हुए हैं और उनके सामने टमाटर और मूंगफली का भोजन परोसा हुआ है। सरोजिनी नायडू गांधी की प्रशंसा सुन चुकी थीं, पर उन्हें कभी देखा नहीं था। जैसा कि वो खुद वर्णन करती हैं, कम कपड़ों में गंजे सिर और अजीब हुलिये वाला व्यक्ति और वो भी जमीन पर बैठकर भोजन करता हुआ।
कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनी
सरोजिनी ने भारतीय समाज में फैली सामाजिक को दूर करने के लिए भारत के अलग-अलग राज्यों का दौरा किया महिलाओं को जागृत किया। वो काफी समय तक वे कांग्रेस की प्रवक्ता भी रहीं। 1925 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। उन्हें वर्ष 1908 में उन्हें अंग्रेजों ने कैसर-ए-हिन्द के सम्मान से नवाजा था, लेकिन जलियांवाला बाग हत्याकांड से क्षुब्ध होकर उन्होंने इस सम्मान को वापस कर दिया था।
यूपी की बनी राज्यपाल
आजाद भारत में जब उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया तो वह उनका कहा टाल नहीं सकीं। हालांकि इसके बावजूद उन्होंने ये जरूर कहा कि वह खुद को एक कैद किए गए पक्षी की तरह महसूस कर रही हैं। 2 मार्च 1949 को उनका देहांत हो गया था।
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